Friday, July 19, 2013

मोटापे और अस्थमा के बीच है संबंध : अध्ययन

न्यूयार्क। वैज्ञानिकों का कहना है कि अस्थमा में लगातार होने वाली जलन के पीछे जो जीन काम करते हैं वह मोटे लोगों में अधिक सक्रिय हो सकते हैं। यूनिवर्सिटी आफ बफलो के शोधकर्ताओं ने मोटापे और अस्थमा के बीच कई जैविक संबंधों का पता लगाया है। शोधकर्ताओं में भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक भी शामिल हैं।
विश्वविद्यालय के एंडोक्रायनोलॉजी, डाइबिटीज और मेटाबॉलिज्म विभाग के प्रमुख परेश डंडोना ने कहा, हमारे अध्ययन में मोटे लोगों के वजन में कमी के माध्यम से अस्थमा को नियंत्रित करने के तरीकों का पता लगाया गया।
शोध में दो तरह के अध्ययन किए गए। इनमें मोटे लोगों और सामान्य वजन वाले लोगों के बीच तुलनात्मक अध्ययन और अलग-अलग जैविक संकेतकों में होने वाले बदलावों के अध्ययन से जुड़ा प्रयोग शामिल है। इन संकेतकों में अस्थमा से जुड़े जीन शामिल हैं। मोटापे से बुरी तरह ग्रस्त मरीजों की गैस्ट्रिक बाईपास सर्जरी के समय इन जैविक संकेतकों में बदलाव आता है।
तुलनात्मक अध्ययन में वैज्ञानिकोें ने पता लगाया कि अस्थमा में लगातार होने वाली जलन के लिए जिम्मेदार चार जीन, मोटापे से ग्रस्त लोगों में अधिक सक्रिय थे। कुछ मामलों में इनकी सक्रियता 100 प्रतिशत अधिक थी। सबसे अधिक सक्रियता, मोटापे की बीमारी से ग्रस्त लोगों लोगों में देखी गयी।

स्मार्ट चाकू देगा कैंसर की जानकारी

लंदन। वैज्ञानिकों ने एक ऐसा स्मार्ट चाकू इजाद किया है जो आॅपरेशन करने वाले सर्जन के किसी इंसानी ऊतक पर लगाते ही बता देगा कि मरीज को कैंसर है या नहीं। दरअसल, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का इलाज आॅपरेशन ही है क्योंकि चिकित्सक शरीर के किसी भी अंग में बन चुके ठोस ट्यूमर को सिर्फ देखकर नहीं बता सकता है कि इसमें कैंसर के सेल बनने लगे हैं या नहीं।
आमतौर पर डाक्टर मरीज के ट्यूमर के कुछ ऊतक लेकर उसकी बकायदा चीर-फाड़ करके ही बता पाता है कि ट्यूमर कैंसर युक्त है या नहीं। ऐसी सूरत में सिर्फ मरीज का आॅपरेशन ही असली इलाज है। लेकिन स्मार्ट चाकू जैसी खोज ने इस मुश्किल को आसान कर दिया है। अब केवल ट्यूमर या शरीर में बन गई गांठ को इस चाकू से छूकर ही बताया जा सकता है कि किस ऊतक (टिशु) में कैंसर है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस खोज से अब कैंसर है या नहीं, के साथ ही उसके फैलाव का भी सटीक पता होगा। लिहाजा, कैंसर निकालने के लिए बार-बार मरीज का आॅपरेशन नहीं करना होगा।
स्तन कैंसर के हर पांच में से एक मरीज को एक के बाद दूसरा आपरेशन भी कराना पड़ता है। आइ-नाइफ ने अपने पहले परीक्षण में ही आॅपरेशन थिएटर में 91 मरीजों के रोगग्रस्त ऊतकों की सौ फीसद सही जांच की। ए चाकू ऊतक पर लगाते ही तुरंत बता देता है कि मरीज को कैंसर है या नहीं। बल्कि परंपरागत तरीके से पैथ-लैब में परीक्षण कराए जाने पर कम से कम आधे घंटे का समय लगता है। वैज्ञानिकों ने आइ-नाइफ को इल्कट्रोसर्जरी पर आधारित किया। इस तकनीक की सबसे पहले खोज सन 1920 में हुई थी। इल्कट्रोसर्जरी आजकल आमतौर पर प्रयुक्त होती है। इल्कट्रोसर्जिकल चाकू एक इलेक्ट्रिकल करंट का इस्तेमाल करके संदिग्ध ऊतक को गर्म करता है। उसे काटकर उसका परीक्षण करता है। इस प्रक्रिया में कम से कम खून निकलता है। इस प्रक्रिया के तहत ऊतक का वाष्पीकरण किया जाता है। इससे ऊतक से धुआं उठता है।
लंदन के इम्पीरियल कालेज के आइ-नाइफ के खोजकर्ता डॉ. डोल्टन टाकाट्स ने दावा किया ऊतक से उठने वाला धुआं जैविक सूचनाओं का संवर्धित स्त्रोत हो सकता है। उन्होंने आइ-नाइफ बनाने के लिए इस चाकू को एक मास स्पैक्टोमीटर से जोड़ दिया। इस उपकरण का काम किसी भी नमूने में मौजूद रसायनों की पहचान करना होता है। तीन सेकेंड से भी कम समय में ए उपकरण आपरेशन के दौरान मरीज के ऊतक की तुलना लाइब्रेरी में पहले से मौजूद कैंसर के ऊतकों की रासायनिक क्रियाओं से कर लेता है।

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